21 January, 2014

पत्थर के आंसू- ब्रह्मदेव

जब हवा में कुछ मंथर गति आ जाती है, वह कुछ ठंडी हो चलती है तो उस ठंडी-ठंडी हवा में बिना दाएं-बाएं देखे चहचहाते पक्षी उत्साहपूर्वक अपने बसेरे की ओर उड़ान भरते हैं। और जब किसी क्षुद्र नदी के किनारे के खेतों में धूल उड़ाते हुए पशु मस्तानी चाल से घंटी बजाते अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं, उस समय बगल में फाइलों का पुलिन्दा दबाए, हाथ में सब्जी का थैला लिए, लड़खड़ाते कदमों के सहारे, अपने झुके कंधों पर दुखते हुए सिर को जैसे-तैसे लादे एक व्यक्ति तंग बाजारों में से घर की ओर जा रहा होता है।
‘अरे एक बात तो भूल ही गई,’ कलम ने फिर कहा, ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।’
‘अरे कैसे?’ सब ने आश्चर्य से पूछा।
‘उन्होंने लिखा कि काश! मैं पेपरवेट होता, मेज-कुर्सी की तरह फर्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहे जो होता पर मैं इंसान न होता।’
‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज गीली हो उठी, उसके आंसू झिलमिला उठे।
अधपकी झब्बेदार बेतरतीब मूंछें, चेहरे पर कुछ रेखाएं, जिनकी गहराइयों में न जाने कितने अरमान, आशाएं और अतृप्त साधें सदा के लिए दफन हैं और जिन्हें संसार के सबसे क्रूर कलाकार चिंता ने अपने कठोर हाथों से बनाया है। घिसा हुआ कोट जो कि दो साल पहले बड़ी लड़की की शादी पर बनवाया था, पहने और अपनी सूखी टांगों पर अति प्रयोग के कारण पायजामा बन चुकी पतलून से ढंके कठपुतली की तरह निर्जीव चाल से चला जा रहा यह व्यक्ति मानव समाज का सब से दयनीय प्राणी दफ्रतर का बाबू है। नाम छोटा बाबू- क्योंकि बड़े साहब के बाद इन्हीं का नंबर है, पर काम है बड़े साहब से भी अधिक। दफ्तर बंद हो गया है, घर जा रहे हैं। इनके बाद दफ्तर में क्या होता है, शायद इन्हें पता नहीं। शायद इन जैसे जो अन्य लाखों बाबू हैं, उन्हें भी पता नहीं।
दफ्रतर बंद हो गया, चैकीदार सब दरवाजे पर ताले टटोल कर देख चुका था। धूप लाजवंती वधू की तरह सिमट कर क्षितिज के पीछे जा छिपी। अंधकार चोर की तरह चुपके से दफ्रतर के कमरों में से गुजरता हुआ सड़क, मैदान और खेतों पर पाले की तरह छा गया। छोटे बाबू के कमरे में घुप्प अंधेरा और सन्नाटा था। जान पड़ता था, जैसे बरसों से इस कमरे में कोई नहीं आया। तभी इस सन्नाटे में किसी की क्षीण-सी आह सुनाई दी। दबी हुई ठंडी सांस भी उसके साथ मिली थी, ‘कौन है यह?’ बड़े साहब की कुर्सी ने सहानुभूति पूर्ण स्वर में पूछा। दफ्रतर बंद होने के बाद कमरे के शासन में वह कठोरता नहीं थी, जो मीठी-मीठी पालिश की हुई बातें करने वाले बड़े साहब में थी।
‘यह मैं हूं ।’ छोटे बाबू की मेज पर रखी कलम ने पतली आवाज में कहा। कमरे के अन्य सदस्य बड़े साहब की कुर्सी, दवात, पेपरवेट, रद्दी की टोकरी आदि पर बच्चों का-सा स्नेह रखते थे, क्योंकि यह अभी नई ही आई थी। इसके स्थान पर जो पुरानी कलम थी, उसकी आकस्मिक मृत्यु एक एक्सीडेंट में हो गई थी।
‘यह मैं हूं।’ छोटे बाबू की कलम ने फिर कहा, जिसे सुन कमरे के सदस्यगण चिन्तित हो उठे। परिवार में आई नव-वधू के मुख पर आह क्यों? अभी तो उसके खेलने-खाने के दिन हैं!
‘क्या बात है, किस बात का दुख है?’ बड़े साहब की कुर्सी ने फिर पूछा।
‘कुछ नहीं, कुछ नहीं, यूं ही मुख से आवाज निकल गई थी।’ छोटे बाबू की कलम ने हंसने का बहाना करते हुए कहा। ‘नहीं जी, कुछ बात जरूर है। आज जब से दफ्रतर बंद हुआ है, तभी से मैं तुम्हें बेचैन देख रहा हूं। क्या बात है बोलो?’ छोटे बाबू की दवात ने जरा रौब जमाते हुए खोखली आवाज में कहा।
इस रौब का असर हुआ, कमसिन कलम सहमी हुई बोली, ‘बड़ी भयानक बात है जीजी, पर आज नहीं बताऊंगी, कल बताऊंगी।’
‘अजी मियां, हटाओ भी, किस चक्कर में पड़े हो?’ अचानक ही कोई भारी ठस्स आवाज बोली, ‘यहां हम अपने ही चक्कर में पड़े हैं। खुदा की कसम, आज दोपहर से इतना गुस्सा आ रहा है, इस मरदूद बड़े साहब पर कि कुछ पूछो मत। बेचारे छोटे बाबू को इतना डांटा कि उनका मुंह उतर गया। अगर मैं होता न छोटे बाबू की जगह तो सब साहबी एक ही झापड़ में निकाल देता।’ कमरे में अंधकार स्वयं इधर-उधर भटक रहा था, दिखाई कहां से देता। हां, आवाज से मालूम होता था कि छोटे बाबू की मेज पर रखे पेपरवेट महाशय बोल रहे हैं।
छोटे बाबू से इस कमरे के सब निवासियों की सहानुभूति थी। बड़े साहब की हरकत पर सबको असंतोष था, पर अभी तक प्रकट किसी ने नहीं किया था। पेपरवेट की बात सुन कर सब ने अपना-अपना असंतोष प्रकट करना आरंभ कर दिया। कमरे में शोर होने लगा। सभी अपनी-अपनी हांक रहे थे। खूब गुलगपाड़ा मचा हुआ था। तभी सहसा दरवाजे पर टंगे पर्दे की सरसराती हुई आवाज आई, ‘दुश्मन!’ और सब एकदम चुप हो गए, मानो किसी ने बड़बड़ाता रेडियो एकदम बंद कर दिया हो। बाहर बरामदे में चैकीदार खटखट करता गुजर गया। कमरे में फिर से बड़े साहब की आलोचना होने लगी। तभी खटखटाती हुई आवाज में टाइपराइटर ने कहा, ‘भई गलती तो असल में मेरी थी। छोटे बाबू ने तो अपनी तरफ से ठीक ही टाइप किया था। क्या बताऊं, जब से इस पक्के फर्श पर गिर कर चोट लगी है, मुझ से ठीक से काम नहीं होता। दर्द बहुत होता है। मुझे अफसोस है कि मेरे कारण बेचारे छोटे बाबू को अपमानित होना पड़ा।’
बड़े साहब की मेज के नीचे कुछ झन-झन की अवाज हुई। बड़े साहब की मेज ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘ठहरो, मांजी कुछ कर रही हैं।’
रद्दी की टोकरी इस कमरे के निवासियों में सब से बूढ़ी थी। दफ्रतर पहले किसी और स्थान पर था, परन्तु जब यह नया भवन बना तब यही एक थी जो वहां से बच कर यहां आ गई थी। इसके साथ के कई साथी गंदे नाले के रमणीय तट पर बसे कबाड़ी आश्रम में अब भगवत भजन में शेष जीवन बिता रहे हैं। कमरे के अन्य निवासी इन्हें बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे और मांजी कह कर पुकारते थे। मांजी अब बहुत वृद्ध हो गई थी। अब और तब का सवाल था। आवाज भी काफी मद्धम पड़ गई थी। वह छनछनाती आवाज में बोली, ‘क्या बताऊं। उस दिन मुझ से गलती हो गई, वरना बड़े साहब तो बंधे-बंधे फिरते।
‘वह जो उस दिन सरकारी सर्कुलर आया था, वह बड़े साहब ने जल्दी में भूल से मेरे हवाले कर दिया। चपरासी जब रद्दी को बाहर जमादार के डोल में डालने लगा तो वह सर्कुलर मैंने अपनी गोद में बच्चे की तरह छिपा लिया। अगले दिन जब उसके बारे में सारे दफ्रतर में कोहराम मचा तो मैंने निकाल कर दे दिया। जो कहीं उस दिन वह कागज मैं जाने देती तो बड़े साहब को भी पता चल जाता कि साहबी कितनी महंगी है। भैया, जो बुड्ढे कर देते हैं, वह आजकल की छोकरियां क्या करेंगी? इन्हें तो अपनी सिंगार-पटार से ही फुर्सत नहीं। कोई चीज कहीं पड़ी है, कोई कहीं, किसी बात का ध्यान ही नहीं। बस मैं संभालूं। जिन्हें सब दुत्कारते हैं उन्हें मैं संभालती हूं। अपनी गोद में उनको जगह देती हूं, जिन्हें दुनिया किसी काम का नहीं कहती। इस पर नाम मेरा रखा है- रद्दी की टोकरी। खैर, इसका मुझे मलाल नहीं, क्योंकि इतनी उम्र तक दुनिया देखी है। यह देखा है कि जिस का भला करो उसी से बुराई मिलती है। पर छोड़ो इन बातों को। अब हमें क्या लेना-देना है? उमर ही कितनी रह गई है? खाट से चिपकी बुढ़िया हूं, अब गई तब गई की बात है और फिर…!’ न जाने यह बुढ़िया-पुराण कब तक चलता, यदि मुर्गे की बांग भिनसार की ठंडी हवा की अंगुली पकड़े रोशनदान के रास्ते से कमरे में न घुस जाती।
आज दफ्तर खुलते ही जो बेचैनी नजर आई, वह इस दफ्रतर के लिए नई थी। बेचारा दफ्रतर परेशान था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज इन सब को क्या हो गया है? बड़े साहब से लेकर चपरासी तक सब बेचैन, उदास घबराए-से क्यों हैं? उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। आखिर हारकर उसने आंगन में खड़े आम के पुराने पेड़ से पूछा। शायद उसे कुछ पता हो, पर वह इन नए छोकरों की अजीब बातों से परेशान था। उसने भी अपना सिर खुजलाया, जिसका मतलब था कि इस बेचैनी का कारण उसे भी पता नहीं। किस से पूछा जाए? शायद फाटक को पता हो, पर तभी आंगन से कुछ बातचीत की आवाजें आने लगीं। ‘पर आखिर छोटे बाबू ने आत्महत्या की क्यों?’ कोई पूछ रहा था।
‘अच्छा तो यह बात थी, बहुत बुरा हुआ।’ दफ्रतर ने सोचा और बात-बात में यह खबर दीवारों, दरवाजों, चिकों, पर्दों से होती हुई दफ्तर में चारों ओर फैल गई। छोटे बाबू की आकस्मिक और करुणाजनक मृत्यु के कारण शोक छाया हुआ था। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार उनकी आत्महत्या का कारण बता रहा था। बड़े साहब कह रहे थे, ‘अगर ऐसी बात थी तो उन्होंने मुझे कहा क्यों नहीं? मैं उनकी तनख्वाह जरूर बढ़ा देता।’ सुनने वाले एक वही ठेकेदार साहब थे जो अपने किसी ठेके के सिलसिले में दफ्तर में आए थे। बोले, ‘साहब, यह रुपए-पैसे की तंगी बुरी चीज है, पर उन्होंने तो किसी से कुछ कहा ही नहीं। मुझे ही कह देते तो दो-चार हजार का इंतजाम तो मैं ही कर देता।’
‘कहो भाई, क्या खबर लाए?’ बड़े साहब ने फाटक में से आते हुए एक आदमी से पूछा।
‘बहुत बुरा हाल है, बेचारी छोटे बाबू की वाइफ ने तो रो-रो कर बुरा हाल कर रखा है। घर में जमा पूंजी भी नहीं है जो क्रिया-कर्म का प्रबंध किया जाए। यह चूड़ियां दी हैं, बेचने के लिए!’ उस आदमी ने कहा।
‘अजी, अब रोने-धोने से क्या होता है? उम्रभर तो छोटे बाबू के कान खाती रही- यह ला दो, वह ला दो और सच तो यह है…’ पास खड़े एक अन्य व्यक्ति ने कहा, पर बीच में ही आने वाले व्यक्ति ने टोका, ‘पता नहीं साहब, वह तो मुझसे कह रही थीं कि इतने सीध्ो आदमी थे कि खुद ही सब सामान ला दिया करते थे। मुझे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती थी। खैर, जो भी हो अब बेचारी का दुख नहीं देखा जाता। आज दफ्रतर तो बंद ही रहेगा, हम सब को वहीं जाना चाहिए।’
दफ्रतर बंद हो गया। बड़े साहब कार में बैठ कर घर चले गए। ठेकेदार भी कुछ आवश्यक कार्य के लिए उनके साथ ही गया। बड़े साहब जाते हुए चपरासियों और चैकीदारों को सख्त ताकीद कर गए कि छोटे बाबू के घर वे जरूर जाएं। चपरासियों ने कमरों में ताले लगाए और छोटे बाबू के घर की ओर चल पड़े। दफ्रतर में फिर एक बार शोकपूर्ण सन्नाटा छा गया।
‘बहुत ही बुरा हुआ।’ सब से पहले छोटे बाबू की कुर्सी ने दुख से रुंधे गले से कहा।
‘यह और भी बुरा हुआ कि उन्होंने अपनी मदद के लिए किसी से कुछ कहा भी नहीं।’ इस पर कमरे के सब छोटे-बड़े सदस्य छोटे बाबू के प्रति अपना शोक प्रकट करने लगे। ‘यह जो कहा जा रहा है कि उन्होंने किसी से मदद नहीं मांगी, यह गलत है।’ छोटे बाबू की कलम ने दवात से कहा, ‘कल जो बात मैं कहते-कहते रुक गई थी, वह यही थी।’
‘अरे भई, कुछ सुनते भी हो?’ दवात ने ऊंची आवाज में कमरे वालों को बातें करने से रोका, ‘जरा सुनो तो यह कलम क्या कह रही है? हां जी, अब कहो असली बात क्या है?’
सब चुप हो गए, पर अब कमसिन कलम शर्माने लगी। दवात ने ढांढस बंधाया कि सब अपने ही हैं, शर्माने की क्या बात है, तुम बेखटके कहो।
कलम ने धीरे स्वर में कहना आरंभ किया, ‘यह बात गलत है कि छोटे बाबू ने किसी से मदद नहीं मांगी। उन्होंने बड़े साहब से तनख्वाह बढ़ाने के लिए कितनी ही बार कहा था, पर बड़े साहब ने हर बार उनके काम में जबरदस्ती कोई न कोई कमी निकाल कर इस बात को टाल दिया। कल जब वे घर से दफ्रतर आए थे तो आप सब ने देखा होगा कि उनका चेहरा उतरा हुआ था। बात यह थी कि उनकी पत्नी ने उन्हें काफी खरी-खोटी सुनाई थी कि वे वक्त पर कोई चीज ला कर नहीं देते। मुझे भी कोई जेवर-पत्ता बनवा के नहीं दिया, इत्यादि। इसी सब झगड़े में देर हो गई। उधर आते ही बड़े साहब ने डांट सुना दी। फिर दोपहर को भी जो बुरी डांट उन पर पड़ी थी, वह तो आप सबने सुनी ही है। इधर उन पर कर्ज भी काफी हो गया था। तकाजा दिनों-दिन सख्त होता जा रहा था। पत्नी की फरमाइश, लंबे-चैड़े परिवार का खर्च, साहूकारों के तकादे। यह सब इस छोटी-सी तनख्वाह में कैसे पूरे हो पाते? उनका दिल तो पहले ही टूट गया था, पर कल पत्नी की फटकार और बड़े साहब की डांट ने उस टूटे हुए दिल को पीस डाला। वह निराश हो गए और सब से अधिक धक्का इस बात से लगा कि जब उन्होंने अपनों के आगे गिड़गिड़ा कर मदद के लिए हाथ पसारा तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया।’
‘पर तुम्हें यह सब पता कैसे लगा?’ बड़े साहब की कुर्सी ने आगे खिसकते हुए पूछा।
‘बात यह हुई कि कल शाम दफ्रतर बंद होने से पहले ये सब बातें उन्होंने एक पत्र में लिखीं, पर न जाने फिर क्या सोच कर वह पत्र फाड़ कर फेंक दिया। मैंने तो सब लिखी ही थीं, इसलिए मुझे बातें याद रहीं।’
‘जी तो चाहता है कि इंसान की गरदन रेत दूं।’ चाकू ने तीखी आवाज में कहा। उस पर क्रोध की धार लगी हुई थी।
‘अरे, एक बात तो भूल ही गई,’ कलम ने फिर कहा, ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।’
‘अरे, कैसे?’ सब ने आश्चर्य से पूछा।
‘उन्होंने लिखा कि काश! मैं पेपरवेट होता, मेज-कुर्सी की तरह फर्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहे जो होता, पर मैं इंसान न होता।’
‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज गीली हो उठी, उसके आंसू झिलमिला उठे।

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