बिमला मात्र 15 वर्ष की थी, जब वह दुल्हन बनकर सुसराल आई। उसकी सुसराल में बहुत छोटा सा परिवार था। वह, उसकी बूढ़ी सास दुलारी और उसका पति किशोर। विमला लंबे कद, चुस्त बदन और गेहुएं रंग की युवती थी। सामान्य नाक-नक्शा वाला उसका चेहरा सदैव मुस्कान भरा रहता था। इसी सबसे वह आकर्षक दिखती थी। उसमें जीवन के प्रति उत्साह तथा गृहस्थ संभालने की लगन थी। अतः बहुत कम समय में ही उसने गृहस्थ का पूरा दायित्व संभाल लिया। दुलारी, जिसने अपने पूरे जीवन कष्ट ही उठाये थे, विमला के स्वभाव और कार्य कुशलता से अत्यधिक प्रसन्न थी। उसने अपना ध्यान ईश्वर भक्ति की ओर लगाना प्रारंभ कर दिया। कभी-कभी उसे अपना अतीत याद आता था। किशोर के पिता का देहांत मात्र 35 वर्ष की अवस्था में हो गया था। तब किशोर केवल दस वर्ष का था। उसकी परवरिश के लिये दुलारी ने क्या-क्या नहीं सहा? बड़े प्रयासों से एक स्कूल में उसे चतुर्थ श्रेणी की नौकरी मिल पाई । यही मां-बेटे की जीविका का आधार था। उसके लाख प्रयासों के बाद भी किशोर पढ़ न पाया। अतः उसने गली में एक छोटी सी दुकान खोल ली। भाग्य ने साथ दिया और किशोर की दुकान चलने लगी। आज दुलारी बहुत खुश है। शायद उसने जीवन में इतने सुख की कल्पना भी नहीं की थी कि उसका छोटा सा परिवार एक दिन सब बाधाओं को पार कर सुख का किनारा पा लेगा। आज वह ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देती है, जिसने उसके अतीत के दुखों का अंत किया।
जहां से दुलारी के दुखों का अंत हुआ, वहीं से विमला के दायित्वों का प्रारंभ। विमला ने गृहकार्य के साथ-साथ परिवार के अन्य दायित्वों को भी संभाल लिया। पांच वर्ष में उसे तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई। यहां तक सब अच्छा व सुखकर था। धीरे-धीरे विमला के जीवन में परिवर्तन होने लगा। पति को न जाने कब पीने की लत लग गई। वह रात में देर से घर आता और अधिकतर अस्वस्थ रहता। विमला यह सब अपने पर बर्दाश्त करती रहती। वह सास को इस सबका एहसास न होने देती। वह अकेली ही बच्चों को संभालती, बूढ़ी सास की सेवा करती और सारे दायित्वों को निबाहती रहती। विमला पति की कमजोरियों को बर्दाश्त करती और परिस्थितियों को सामान्य बनाये रखती। इसी बीच न जाने कब शारीरिक कमजोरी ने उसे घेर लिया। वह दिनों-दिन चिड़चिड़ी और असंतुलित होने लगी। इसी समय विमला की सास भी चल बसी। अब उसके दिल का बोझ बांटने वाला कोई न रहा। किशोर मनमर्जी से घर आता, घर जरा भी अस्त-व्यस्त देखकर गुस्सा करता और अपना सब कार्य समय पर पूरा चाहता। दुकान पर समय से ने बैठने के कारण वहां आय में भी कमी होने लगी।
विमला का स्वभाव पहले से बदलने लगा। वह चिड़चिड़ी और गुस्सैल हो गई। कभी-कभी वह अपना संतुलन खो देती थी। इस अवस्था में वह घर की चीजों को उठाकर पटक देती, बच्चों को पीटती और स्वयं भी दुखी रहती। किशोर, जो स्वयं हर जिम्मेदारी से कतराता था, विमला से यही चाहता था कि वह सदैव कर्मठ और आज्ञाकारिणी बनी रहे। फिर उसे विमला का यह क्रोध कैसे बर्दाश्त होता? अतः बगैर परिवार के विषय में सोचे अचानक उसने फैसला कर लिया कि विमला को पागल खाने भेज दिया जाये। विमला नहीं जानती थी कि उसके साथ क्या होने वाला है। उसकी कमजोरी और बीमारी का इलाज कराने के बहाने किशोरी उसे पागलखाने ले गया और वहीं छोड़ आया। बेचारी अनपढ़ विमला पागलखाने या सामान्य अस्पताल में अंतर न कर पायी और वहीं रह गई। कुछ दिनों के साधारण उपचार के बाद विमला पूर्ण स्वस्थ हो गई। अब उसे घर भेजा जा सकता था। पागलखाने के अधिकारियों के द्वारा बार-बार पत्र व्यवहार करने पर भी न पत्र का उत्तर मिला और न कोई उसे लेने आया। विमला बहुत दिनों तक रोई, तड़पी और बेचैन रही। उसे रह-रहकर अपने बच्चों की याद आती। उसे बार-बार लगता कि उसके बच्चे कष्ट में हैं। वह उन्हें पाना चाहती थी। वह अपने परिवार में लौट जाना चाहती थी। मगर किशोर द्वारा दिये गये पते में संदेह होने के कारण विमला को घर न भेजा जा सका और किशोर को उसे लेने न आना था, न वह आया।
समय ने विमला की घर की याद को धुंधला कर दिया और कब और कैसे वह पागलखाने को ही अपना घर समझने लगी, यह एहसास उसे स्वयं भी न हो पाया। पता भी न चला कि वह कब मरीज से परिचारिका बन गई और पागलखाने की एक सदस्य बन गई।
नये आये मरीजों को धैर्य से संभालना, किसी के अस्वस्थ होने पर रात-रात भर बैठकर उसकी सेवा करना, मरीजों को नहलाना, खिलाना, दवा देना और उनकी सुख-सुविधा का ख्याल रखना, यही विमला की दिनचर्या हो गई। उसे स्वयं के लिये भी कुछ करना है, किसी को उसकी भी देखभाल करनी चाहिए, ये ख्याल कभी उसके मन में न आते थे। दूसरे मरीजों को उसकी सेवा की आवश्यकता है, वह केवल इसी एक पक्ष पर विचार करती थी। विमला जब यहां आई तो 40 वर्ष की थी, आज वह 50 की उम्र पार कर चुकी है। इतना समय उसने कैसे और किसके लिये बिताया, इसका उसे कोई मलाल नहीं। अब तो वह पूर्ण रूप से स्वयं को इसी वातावरण में ढाल चुकी है। परिवार और बच्चों की याद उसके लिये स्वप्न की भांति है। आज उसे उन बातों से न कोई मोह है, न गिला, यहां तक कि अब उसे किसी से मिलने की कोई लालसा भी शेष नहीं है।
अस्पताल में नई आई कमला कुछ ज्यादा ही उदंड है। वह खाना उठाकर फेंक देती है, अनाप-शनाप बकती है और परिचारिकाओं की पिटाई तक कर देती है। इसकी सुश्रुषा की जिम्मेदारी विमला को दी गई, क्योंकि धैर्य से उसको संभालना और दवा देना वही कर पाती थी। शेष कर्मचारी उसके पास जानने से कतराते थे। कमला ने प्रेम विवाह किया था। विवाहोरांत उसे पति के अन्यत्र संबंधों का पता चला और इसी सदमे में उसका दिमाग खराब हो गया। वह पति के प्रति घृणा से भरी थी। अतः पुरुषों को देखते ही अभद्र शब्दों की बौछार करती थी। यदि कोई उसे रोकता-टोकता तो जो हाथ लगता उठाकर मार देती। विमला ने बहुत स्नेह से उसे नियंत्रित किया। उसकी सेवा से वह काफी ठीक भी हो गई। वह अब विमला को अपनी मां जैसा मानती थी और कभी-कभी उसके सामने बच्चों की भांति फूट-फूट कर रोने लगती थी।
एक सुबह विमला कमला के कार्यों में व्यस्त थी कि चैकीदार ने आकर बताया, ‘‘दीदी, आप से कुछ लोग मिलने आये हैं।’’
विमला को अपने कानों पर विश्वास न हुआ। वह यह सोच भी नहीं सकती थी कि इस संसार में कोई उससे मिलने की इच्छा रखता है। वह अवाक चैकीदार की ओर देखती रही। चैकीदार ने पुनः जोर से कहा, ‘‘विमला दीदी, आपके परिवार के कुछ लोग आपसे मिलने आये है।।’’
इस बार विमला के मुंह से निकला, ‘‘मेरे परिवार के?’’
चैकीदार, ‘‘हां, आपके परिवार के।’’
विमला उठी और भावशून्य सी चैकीदार के पीछे चल पड़ी। गेट के पास जाकर उसने देखा, एक नौजवान, एक युवती और छोटे-छोटे दो बच्चे उसकी प्रतीक्षा में खड़े हैं। युवक ने आगे बढ़कर विमला के चरण स्पर्श किये। युवती ने भी और फिर बच्चों ने भी। विमला भाव विह्वल हो उठी। उसके मुंह से एक भी शब्द न निकला। उसने आशीर्वाद में दोनों हाथ उठाये और पुत्र से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। इतने वर्षों बाद भी मां की ममता ने स्पष्ट पहचान लिया था कि यह उसका मंझला बेटा किशन है। आठ बरस का वह भोले चेहरे और हल्के बदन वाला किशन अब गठीले बदन और आकर्षक चेहरे वाला युवक बन गया था।
किशन ने मां से अपने साथ चलने का आग्रह किया। मगर विमला अब पागलखाने की दुनिया से भी अन्तरात्मा से जुड़ चुकी थी और इसे छोड़ना नहीं चाहती थी। परन्तु बेटे के आग्रह के सामने ममत्व को झुकना पड़ा और विमला ने बेटे-बहू के साथ जाना स्वीकार कर लिया।
विमला की विदाई किसी साधारण मरीज की विदाई न थी। वह तो इस संस्था का अंग थी। मरीज हो या कर्मचारी, सभी को उसका जाना दुखकर था, विशेष रूप से कमला, जिसको उसने सबकी दुत्कार के बीच मां का प्यार दिया था। वह रो-रो कर उसका आंचल पकड़ रही थी और रुकने का आग्रह कर रही थी। विमला ने उसे दुलारते हुये शीघ्र मिलने आने का वायदा किया।
मां को साथ लिये किशन घर आया। तीन कमरों का छोटा सा घर था। मगर बेटे-बहू ने पहले से ही उसकी सुविधा की वस्तुएं जुटा कर रखी थीं। उसका पलंग, कपड़े, पूजा का समान सब कुछ! मानो ये वस्तुएं उसके आने की प्रतीक्षा ही कर रही थीं। विमला ने घर आकर एक अवर्णित सुख का एहसास किया। उसे ऐसा लगा मानो बचपन में जो सुख और सुरक्षा मां की गोद में मिलती थी, वैसा ही आनंद आज मिला है। दोनों पौत्र- सोहन व मोहन बहुत खुश थे। आज उन्हें परिवार में एक ऐसे सदस्य की प्राप्ति हुई थी, जिससे वे अपने मन की बात कह सकते थे, किस्से और कहानी सुन सकते थे और उसके साथ खेल सकते थे। दोनों बार-बार दादी के पास आ रहे थे और घर की चीजों से उसका परिचय करा रहे थे, मानो वह उनकी हमजोली हो। बहू शीला भी सास की सुविधाओं के प्रति सजग थी और मधुरता के साथ ही सुविधाओं का ख्याल रख रही थी।
रात्रि में खा-पीकर जब सब निवृत्त हुये तो किशन आकर मां के पास बैठ गया। बहू बच्चों को सुलाने चली गई। विमला ने अतीत के पन्ने पलटने चाहे। उसने किशन से कहा, ‘‘बेटा, मैंने तुम्हें कब, कहां, क्यों और किस हाल में छोड़ा, मैं नहीं जानती। मुझे बस इतना याद है कि परिवार में हम पांच सदस्य थे। मैं, तुम तीन भाई और तुम्हारे पिता। तुम तीनों की शक्ल धुंधली सी याद रही, शेष कुछ नहीं।’’
किशन बोला, ‘‘मां, तुम्हें छोड़कर जब पिता जी घर लौटे तो छोटे भाई को बुखार था। हम यही जानते थे कि तुम लौटकर आओगी। मगर तुम्हें न पाकर उसकी तबीयत और बिगड़ गई तथा एक सप्ताह के ज्वर में ही उसकी मृत्यु हो गई। हम दोनों भाई घर का कार्य करने का प्रयास करते थे। कभी-कभी खाना बनाने में पिता जी सहायता करते, मगर वे अधिकतर घर देर से आते और बगैर खाये ही सो जाते। उनका चेहरा पीला व शरीर अत्यधिक कमजोर हो गया। एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हुई और अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल वालों ने ही उनका दाह-संस्कार किया। हम बिल्कुल अकेले रह गये। पड़ोसी दादा ने हमें अनाथ आश्रम भिजवा दिया था। वहां बड़े भाई का साथ कुछ बड़े बच्चों से हुआ और एक दिन मुझसे शीघ्र आने का वायदा कर रात में चार साथियों के साथ चला गया। उसने मुझे भी वहां से शीघ्र ले जाने का आश्वासन दिया था, पर आज तक लौट कर न आया।’’
किशन एक सांस में ही यह सब कह गया, मानो वह इसी इंतजार में था कि कोई उसकी कहानी सुने। कुछ देर रुककर उसने फिर कहना शुरू किया। विमला ध्यान लगाये चुपचाप उसकी कहानी सुन रही थी। बीच-बीच में वह लंबी सांस लेती, जो उसके दिल में दबे गहरे दुख को व्यक्त कर रहा था। किशन ने आगे कहा, ‘‘अनाथ आश्रम के दस वर्ष मैंने किस पीड़ा में बिताये, कहना नहीं चाहता। सुनकर मां तुम्हें कष्ट ही होगा। बस, इतना अच्छा रहा कि मैं वहां अपनी पढ़ाई जारी रख सका। उसके लिये खर्च बराबर मिलता रहा। बी.ए. पास करने के बाद मुझे प्लास्टिक का सामान बनाने की इस फैक्ट्री में नौकरी मिल गई। यह घर भी फैक्ट्री का दिया हुआ है। शीला (पत्नी) भी अनाथ आश्रम में पली है। हमारी बहुत इच्छा थी कि एक बार आपसे व बड़े भाई से मिल सकें।’’
किशन की कहानी समाप्त हो जाने पर विमला ने बोलना प्रारंभ किया, ‘‘बेटा, जब तुम्हारे पिता मुझे छोड़कर आए तो मुझे ऐसा लगा कि कुछ उपचार के बाद मैं घर लौट जाऊंगी। उस समय परिवार व बच्चों को छोड़ने का मुझे विशेष कष्ट न हुआ। शायद ऐसा मेरे मानसिक विकार के कारण हो। मगर जैसे-जैसे मेरी चेतना लौटी, पीड़ा बढ़ने लगी। मुझे घर व बच्चों की याद सताने लगी। मगर मैं मजबूर थी। मुझे न अपने घर का पता याद था, न पति का नाम। तुम्हारे पिता द्वारा दिये गये पते पर डाले गये पत्रों का जब कोई जवाब न मिला, तो पागलखाने वालों ने उसे जाली समझा और मैं वहीं रह गई।’’ विमला ने गहरी सांस भरकर आगे कहा, ‘‘तब से हर दिन मैंने अपने परिवार की याद में और अपने जैसी मजबूर औरतों की जिंदगी संवारने में लगाया है। आज ईश्वर ने मेरी इच्छा पूरी कर दी। आज जो सुख मिला है, अतीत के दुखों को जीतने के लिये काफी है।’’
किशन ने बताया कि पागलखाने के चैकीदार के माध्यम से ही वह मां को पा सका। उसके साथ फैक्ट्री में चैकीदार का ममेरा भाई कार्य करता है। पिछले माह चैकीदार उससे मिलने आया। उसके भाई ने उसका परिचय उससे कराया और उसकी दुख भरी कहानी भी सुनाई। चैकीदार ने बताया कि उसके यहां इस कद-काठी की एक महिला है। फिर फोटो देखकर चैकीदार ने विश्वास से कहा था, ‘आपकी मां हमारे यहां है।’ ‘‘उसकी जमानत पर आपको हमारे साथ भेजा गया है।’’ इतना कहकर किशन आंखें बंद कर मां की गोद में सिर रखकर लेट गया। मां स्नेह से उसका सिर सहलाने लगी और अनजाने ही दोनों की आंखों से अश्रुधार बह निकली।
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